स्वस्थ मन (Healthy Mind)

स्वस्थ मन (Healthy Mind)



जितना है उतने में संतोष करना।

संतोष सर्वोत्तम गुणों में से एक है। यह इंसान के मन की सुंदरता को प्रकट करता है। संतोषी व्यक्ति में सहनशीलता, त्याग और उदारता जैसे गुण अपने आप ही विकसित हो जाते हैं। संतोषी व्यक्ति हर परिस्थिति में खुश और संतुष्ट रहता हैं। ये आवश्यक नहीं कि अत्यधिक धन सम्पदा आने पर भी हम खुश रह पाएंगे। वास्तविक खुशी तो संतोष में है। थोड़ा कठिन जरूर है लेकिन कोशिश करने से हम इस श्रेष्ठ गुण को अपने व्यवहार में शामिल करने में जरूर कामयाब हो पाएंगे। जितना भी आपके पास है उसी में खुश रहे और ईश्वर का धन्यवाद करें। यही स्वस्थ मन के लक्षण है। जब मन स्वस्थ होगा तो अच्छे विचार आना स्वाभाविक रूप से होगा। और जब विचार ही अच्छे और सुंदर हो जाएंगे तो हमारा जीवन बहुत खुशनुमा होने लगेगा। जीवन आनंद, खुशी एवं उल्लास से भरपूर हो जाएगा। अंततः हमारे जीवन का उद्देश्य भी तो यही है।

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व्यर्थ कचरे को बाहर निकाल फेंके।

ईश्वर ने हमें दिमाग़ रूपी उपहार से सुशोभित किया है। इसके कारण ही हम इंसान को अन्य जीवों से श्रेष्ठ माना गया है। हमें इस दिमाग़ रूपी शस्त्र का प्रयोग अपने आपको और समाज को बेहतर बनाने में करने की आवश्यकता है। तेज़ भागदौड़ भरी जिंदगी में हमने अपने दिमाग में ढ़ेर सारी व्यर्थ की अच्छी बुरी जानकारियां भर ली है जिनका हमारे जीवन में बहुत कम उपयोग होता फिर भी लगातार भरते ही जा रहे हैं। बहुत सारी जानकारी होने के कारण हम सही और ग़लत में पहचान करने में असमर्थ हो जाते हैं। यही कारण है कि आज हम निर्णय लेने में असहाय महसूस करते हैं। जब हम गंदे और मैले कपड़ों को पसंद नहीं करते तो फिर हमें बुरे और दूषित विचारों से भी परहेज करने की आवश्यकता है। तभी हम एक स्वस्थ मन का निर्माण कर पाएंगे। और अपने एवं अपनों के लिए प्रेरणास्रोत बन पाएंगे।

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इच्छाओं और जरूरतों को समझें।


आधारभूत चीजें जो हमें जीवन यापन करने के लिए बहुत जरूरी होती है ज़रूरतें कहलाती हैं। और जिन चीजों की हम कल्पना करते है वो इच्छाएं होती है। इच्छाओं और जरूरतों में अंतर को समझना होगा। रोटी, कपड़ा और मकान हमारी ज़रूरतें है। महंगा खाना, ब्रांडेड कपडें, आलिशान महल इत्यादि हमारी इच्छाएं। इच्छाएं असीमित होती है ये कभी समाप्त नहीं होती। इच्छाओं को पूरा करने की लालसा में हम अपने मन की शांति को भंग कर लेते हैं। और अपने मन को असंतोष, उतावलापन, असंतुष्टता जैसे विचारों से दूषित करते रहते हैं। इनको नियंत्रित करने के लिए संतोष रूपी धन का उपयोग किया जाना चाहिए। 

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खुद की मदद कैसे करें

ईश्वर के लिए भी थोड़ा समय निकालें।


जब कोई नज़र नहीं आता तब परमात्मा नज़र आता है। जब सब चीजों के लिए हम समय निकाल रहे है तो थोड़ा समय परमात्मा के लिए भी निकाल लेना चाहिए। ये सच में असरकारक है। दुःख में तो सब याद करते है, सुख में भी याद करने से कठिन परिस्थितियों में बहुत मदद मिलती हैं। सुबह उठते ही ईश्वर को धन्यवाद दे और मन में सुंदर विचार करें, थोड़े समय में ही हमें भरपूर उर्जा मिलने लगेगी और खुश रहना हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाएगी। जब हम हर काम से पहले हमेशा ईश्वर को याद करते है और उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं तो हमारे आस-पास सभी चीजें अच्छी होने लगती हैं। इससे मन को बड़ा सुकून मिलता है, हमारे मन की शक्ति में वृद्धि होती हैं। हमें स्वास्थ्य और प्रसन्नता का अनुभव होता हैं। स्वस्थ मन से ही स्वस्थ समाज का निर्माण कर पाएंगे और भावी पीढ़ी के लिए कुछ बेहतर कर पाने में सक्षम होंगे।

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स्वर्णिम नियम

खुद पर काम करें

अपनी बैलेंस शीट रोजाना जांच करें


रोजाना रात को सोने से पहले अपने दिन का आंकलन करें कि आज हमने कौन कौन से अच्छे काम किए और क्या क्या बुरे? जैसे हम रूपयों का हिसाब रखते है उसी प्रकार अपने सही और ग़लत का भी हिसाब रखने की आवश्यकता है। खुद की जांच करके हमें अपनी कमियों का पता चलता है और इन कमियों को दूर करने के उपायों के बारे में भी जानकारी मिलती है। सफलता के लिए बस इतना ही करना है कि अपनी कमियों को दूर करते रहे और अपनी योग्यताओं को बढ़ाते जाएं। इस तरह हम अपने मन को स्वस्थ रखने में खुद की मदद करते हैं।

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अधिकार का सही प्रयोग


अधिकार एवं शक्ति हासिल करना उतना मुश्किल नहीं है जितना इनका इस्तेमाल करना हैं। अगर हमें ये नहीं पता है कि अधिकार का प्रयोग कब, कहा और किस तरह करना है तो वास्तव में हम उस अधिकार के योग्य नहीं हैं। अधिकार एवं शक्ति का प्रयोग हमेशा दूसरों की भलाई के लिए किया जाना चाहिए। अधिकार के साथ अनुशासन का ज्ञान अत्यावश्यक है क्योंकि बिना अनुशासन के इसका प्रयोग ग्लानि और पश्चाताप का कारण बनता है। एक स्वस्थ मन में अधिकार एवं शक्ति के प्रयोग की अच्छी समझ होती हैं। जब हमें अपने अधिकार एवं शक्ति के प्रयोग का बोध होगा तब हमारा मन स्वयं ही स्वस्थ होने लगता हैं।

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साधारण जीवन


हमें अपनी भावनाओं और विचारों को सरल बनाने की आवश्यकता है। ज्यादा समझदार होना भी कभी कभी मुश्किलें पैदा करता है। जब हमारा दिमाग कुछ भी सोचने में सक्षम है तो हम अच्छा क्यों न सोचें? हमारे विचारों और भावनाओं से ही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण होता है। हमेशा खुश रहने की कोशिश करें, शिकायतें करना छोड़ दें। जब अपने हाथ में न समस्या है और न समाधान तो फिर चिंता किस बात की। सब परमात्मा पर छोड़ दीजिए और निस्वार्थ भाव से सही दिशा में लगातार जुटे रहे, सब कुछ बहुत अच्छा होगा। जीवन बड़ा सुंदर है इसका लुत्फ उठाइए। 

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